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Thursday, September 15, 2011

शादी में सात फेरे क्यों लेते है -Shadi Se Saat Phero Ka Sambandh

आखिर क्या पहेली है ये सात वचन 

विवाह के समय पति द्वारा पत्नि को दिए जाने वाले सात वचनों के महत्व को देखते हुए यहाँ उन वचनों के बारे में कुछ जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ. 
क्या आप जानते है के अगर शादी के एक वचन को सभी शादी शुदा पति-पत्नी अपने जीवन में धारण कर ले तो उनकी हर समस्या का चुटकी में हल निकल जायेगा !
यदि आज भी इनके महत्व को समझ लिया जाता है तो दाम्पत्य सम्बन्धों में उत्पन अनेक समस्यायों का समाधान स्वत: ही हो जाएगा. 

1. तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
  वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!

यहाँ कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना. कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांती ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
किसी भी प्रकार के धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य माना गया है. जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है.पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है.


2. पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !! 

(कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
यहाँ इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृ्ष्टि का आभास होता है. आज समय और लोगों की सोच कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि अमूमन देखने को मिलता है--गृ्हस्थ में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद की स्थिति उत्पन होने पर पति अपनी पत्नि के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देता है. उपरोक्त वचन को ध्यान में रखते हुए वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए.
 

3. जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!
 (तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं(युवावस्था, प्रौढावस्था, वृ्द्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगें, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ)
 

4. कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!

(कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे. अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ती का दायित्व आपके कंधों पर है. यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ )
इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती हैं. विवाह पश्चात कुटुम्ब पौषण हेतु प्रयाप्त धन की आवश्यकता होती है. अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऎसी स्थिति में गृ्हस्थी भला कैसे चल पाएगी. इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ती में सक्षम हो सके. इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो प्रयाप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे.
 

5. स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!
 (इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है. वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है. बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नि से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते. अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नि से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नि का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है. 


6. न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!
 (कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगें. यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ) 
वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं. विवाह पश्चात कुछ पुरूषों का व्यवहार बदलने लगता है. वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नि को डाँट-डपट देते हैं. ऎसे व्यवहार से बेचारी पत्नि का मन कितना आहत होता होगा. यहाँ पत्नि चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्ही दुर्वसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले.
 

7. परस्त्रियं मातृ्समां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !! 

(अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें. यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है--ये आप सब भली भान्ती से जानते हैं. इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है.
देखा आपने कि किस प्रकार ईश्वर को साक्षी मानकर किए गए इन सप्त संकल्प रूपी स्तम्भों पर सुखी गृ्हस्थ जीवन का भार टिका हुआ है.

सपनों का संसार और चन्द्रमा का प्रभाव

चन्द्रमा के अधीन हैं हमारे स्वपनों का संसार

सपनों की दुनिया भी बडी विचित्र होती है । हर इन्सान अपनी जिन्दगी में अच्छे बुरे सपनों के अनुभव से गुजरता है । ये जरूरी नहीं कि सपने हमेशा सुन्दर ही हों, वे अच्छे-बुरे, सुहावने या डरावने कैसे भी हो सकते हैं । इनका संसार अत्यंत असीमित है ओर का इतिहास भी शायद उतना ही पुराना है; जितना कि मानव जाति का इतिहास । सपनों का संबंध हमारे मन से है और यही मन बाह्य एवं आन्तरिक रूप से हमारे समस्त जीवन को क्रियान्वित करता है ।

स्वप्न की विभिन्न परिभाषाएँ :-

  • शरीर शास्त्र(medical science) अनुसार :- नींद आने के बाद यदि मस्तिष्क में रक्त की कमी अनुभव होने लगे अथवा रक्त संचार सुचारू रूप से न हो पाए तो स्वपन दिखाई देने लगते हैं ।
  • इन्द्रिय विज्ञानानुसार :- हमारी पाचन शक्ति के कमजोर होने पर निन्द्रावस्था में स्वपन आने लगते हैं।
  • मानस शास्त्रानुसार:- स्वपन इन्सान की पहुँच से बाहर की स्मृ्तियों का आभास है ।
  • आध्यात्म शास्त्रानुसार:- हमारा सूक्ष्म शरीर नींद की अवस्था में हमारे दिन भर के क्रियाकलापों को चित्रित कर प्रस्तुत करता है,उसे ही स्वपन कहते हैं ।
  • जीवन विज्ञान(life science) अनुसार:- स्वपन इन्सान की एक चमत्कारिक समझ है ।
तात्पर्य है कि निद्रावस्था में मन द्वारा होने वाली क्रियाशीलता के निर्माण को ही स्वपन कहा जाता है ।

मनोवैज्ञानिक मानते है कि स्वपनावस्था मनुष्य के अवचेतन मस्तिष्क की उपज है, भारतीय ज्योतिष भी स्वपन को अवचेतनावस्था का ही परिणाम मानता है किन्तु मस्तिष्क नहीं अपितु मन की अवेचन अवस्था । विज्ञान जहाँ मन ओर मस्तिष्क को एक ही मानता है, वहीं हमारे यहाँ मन और मस्तिष्क दोनों की भिन्नता स्वीकार की गई है । मन एक अलग तत्व है और मस्तिष्क अलग। मन के 2 भाग हैं---चेतन मन और अवचेतन मन । भौतिक जगत के समस्त क्रियाकलाप चेतन मन की क्रियाओं द्वारा ही संपादित होते हैं जब कि अवचेतन मन का 95% भाग सदैव सुप्तावस्था में ही रहता है ।

स्वपन दिखाई देने का सीधा संबंध हमारे इसी अवचेतन मन से ही है । हमारे शरीर में विद्यमान सभी इन्द्रियाँ स्वतंत्र हैं,सबका अपना अपना दायित्व है किन्तु सोते समय  समस्त इन्द्रियाँ मन में ही एकत्र होकर सिमट जाती हैं। उस स्थिति में देखना,खाना,सुनना,सूँघना,स्पर्श करना आदि क्रियाएं विलीन हो जाती हैं ओर तब कर्मेन्द्रियाँ कोई कर्म नहीं कर पाती तथा न ही वे कर्म करने के योग्य रहती हैं । यानि की सोते हुए हमारे शरीर का एकछत्र राजा होता है---मन। सोते हुए हमारे शरीर का समस्त कार्यभार इसी अवचेतन मन के अधीन होता है जब कि जागृ्त अवस्था में चेतन मन के अधीन ।

स्वपन में कईं बार भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को हम साफ साफ या फिर सांकेतिक रूप में देखते हैं! ऎसा क्यों और कैसे ?


विज्ञान अभी इसकी खोज में है । लेकिन वैज्ञानिकों के अलावा इस तथ्य को कोई भी साधारण व्यक्ति नहीं नकारेगा कि उसकी जिन्दगी का कोई न कोई स्वपन अवश्य ही भविष्य में सच हुआ ।

वैदिक ज्योतिष की बात की जाए, तो,चन्द्रमा को मन का कारक तत्व माना जाता है,जो कि हमारे मन की समस्त क्रियायों का संचालन करता है। अब जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चन्द्रमा जिस भाव(house)में स्थित होता है,उस व्यक्ति को अधिकाँशत: उसी भाव से संबंधित पारिवारिक सदस्यों, सगे संबंधियों,वस्तुओं या पदार्थों के ही स्वपन दिखलाई पडते हैं । 

मान लीजिए किसी की जन्मकुंडली में चन्द्रमा चतुर्थ भाव में स्थित है तो उस व्यक्ति को अधिकांशत:चतुर्थ भाव से related माता,भूमी,मकान,सुख के साधन, वाहन, जल, नदी, तालाब, कुँआ, समुद्र, जनसमूह, प्रेमी/प्रेमिका, मित्र इत्यादि से संबंधित स्वपन ही दिखलाई देंगें। क्योंकि उस व्यक्ति का मन(चन्द्रमा) उन सब चीजों में स्थित है,इनमें रमा हुआ है । 

अगर उस व्यक्ति का चेतन मन उन सब वस्तुओं,पदार्थों की प्राप्ति में सहायक नहीं हो पा रहा है या कहें कि उस व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियाँ उन पदार्थों की प्राप्ति के अनुकूल नहीं हैं तो फिर मन अपनी अवचेतनावस्था में उसके लिए स्वपन के माध्यम से मार्गदर्शक का कार्य करता है। 

ऎसा भी नहीं है कि हमें दिखलाई देने वाले सभी स्वपन सिर्फ उन्ही वस्तुओं/पदार्थों से संबंधित ही हों, जहाँ कि जन्मकुंडली में चन्द्रमा स्थित है। इसके अतिरिक्त गोचर में चन्द्रमा जन्मकुंडली के जिस जिस भाव में संचरण करता है,उस उस भाव से संबंधित  कारक तत्वों के बारे में हमें नित्यप्रति स्वपन देखने को मिलते हैं । लेकिन ये कोई जरूरी नहीं कि वो स्वपन हमें सुबह जागने पर याद रह ही जाएँ । इनमे से कभी कभार कोई स्वपन हमें याद रह जाता है अन्यथा शेष स्मृ्ति पटल से विलुप्त हो जाते हैं ।

बनारस भारत का अदभुत संस्कृतिक शहर है! Varanasi City Of God

कहते है बनारस शहर भगवान् शिव के त्रिशूल पर बसा है, काशी कहें या बनारस दोनों का अर्थ एक ही है। काशी से धर्म और आध्यात्म का बोध होता है और बनारस से यहां की संस्कृति जनजीवन और मौज मस्ती का। भौतिक सुख की अंधी बेला में, बनारस का बना हुआ रस तो चौपट हो गया, अब स्मृतियां ही शेष हैं। यह बनारस ही है, जहां गंगा की धारा उलट गई, आम लंगड़ा हो गया, बात बतरस में बदलकर किस्से और कहावत में बदल गई।

बनारस भारत का अदभुत संस्कृतिक शहर है! Varanasi City Of God  


बनारस… वाराणसी… काशी… उत्तरप्रदेश में गंगा के तट पर स्थित इस प्राचीन नगर का जीवंत एहसास वहां जाकर ही किया जा सकता है। सदियों से पुण्यभूमि और तीर्थभूमि के रूप में प्रसिद्ध बनारस आज भी पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और अन्वेषकों को निमंत्रित करता है। बनारस हर व्यक्ति के लिए अलग रूप से उद्घाटित होता है। धर्म, दर्शन और साहित्य से संपूर्ण मानव जगत का हित साधनेवाला यह शहर किसी घने रहस्य की तरह आकर्षक है।
किस्से शहर बनारस के
बनारस का उल्लेख आते ही हमें बनारसी साड़ियों की याद आती है। लाल, हरी और अन्य गहरे रंगों की ये साड़ियां हिंदू परिवारों में किसी भी शुभ अवसर के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। उत्तर भारत में अधिकांश बेटियां बनारसी साड़ी में ही विदा की जाती हैं। बनारसी साड़ियों की कारीगरी सदियों पुरानी है। जड़ी, बेलबूटे और शुभ डिजाइनों से सजी ये साड़ियां हर आयवर्ग के परिवारों को संतुष्ट करती हैं, उनकी जरूरतें पूरी करती हैं। सुहाग का प्रतीक मानी जाती हैं बनारसी साड़ियां। पारंपरिक हिंदू समाज में बनारसी साड़ी का महत्व चूड़ी और सिंदूर के समान है। उत्तर भारत की विवाहित और सधवा स्त्रियां विवाह के अवसर पर मिली इन साड़ियों को बड़े यत्न से संभालकर रखती हैं। टिन के बक्सों में अखबारों से लिपटी इस साड़ी के साथ जीवन के हसीन मोड़ विवाह की यादें जो जुड़ी होती हैं। केवल खास-शुभ अवसरों पर ही स्त्रियां इन साड़ियों को पहनती हैं।

बनारस अपने घाटों के कारण भी प्रसिद्ध है। सुबह के सूर्य की बलखाती व इठलाती ललछौंही प्रथम किरणों के आगमन के पहले ही ये घाट जाग जाते हैं। सलेटी रोशनी में आकृतियां घाटों की सीढियां उतरने लगती हैं। सुबह की नीरवता में हर डुबकी के साथ आती ‘छप’ की आवाज रात की तंद्रा तोड़ती है। धीरे-धीरे बजती घंटियों की लय एक कोरस बन जाती है और नगर जागता है। बनारस नगर अवश्य है, मगर यहां नगर की आपाधापी नहीं है। बनारस की क्षिप्र लय ही इसे बिखरने और बदलने से बचाती है। यहां सबकुछ धीरे-धीरे होता है। कुछ भी अचानक नहीं होता किसी आश्चर्य की तरह। हिंदी कवि केदारनाथ सिंह की पंक्तियां हैं…

इस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है।
यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बांधे है समूचे शहर को

बनारस वरुणा नदी और अस्सी नदी के बीच गंगा तट पर बसा है। यहां गंगा की दिशा बदल जाती है। पश्चिम से पूर्व की ओर बहती गंगा बनारस में दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। पावन गंगा के किनारे बने घाटों की सीढियां बरसों से भारतीय समाज की आस्था को सहारा देती हैं। बनारस किसी नये यात्री के लिए पूरा तिलिस्म है। यह तिलिस्म धीरे-धीरे खुलता है। सच है कि बनारस को जल्दबाजी में नहीं महसूस किया जा सकता। यहां के जीवन की लय आत्मसात करने के बाद ही आप इस शहर की धड़कन अपने अंदर सुन सकते हैं। बनारस जीवन और मृत्यु को जोड़ता जीवंत शहर है। यह संसार की नश्वरता का परिचय देता है। यहां मृत्यु शोक नहीं, मुक्ति है। आश्चर्य नहीं कि देश के कोने-कोने से लोग यहां पहुंचते हैं चिरनिद्रा के लिए। कहा जाता है कि बनारस में मृत्यु का वरण करें तो जीवनचक्र से मुक्ति मिल जाती है। विधवा, अशक्त और निरीह प्राणियों को मृत्यु के पूर्व जीवन देता है बनारस।

Varanasi City of Ghats

अस्सी घाट और राजघाट के बीच अनगिनत घाट हैं, इनमें से मुख्य है दशाश्वमेध घाट। दशाश्वमेध घाट पर कपड़ों और कैनवास की बनी छतरियों के नीचे बैठे पंडे बनारस की खासियत हैं। वे पुण्य, परमार्थ और मुक्ति में सहायता करते हैं आपकी। व्यवसाय का रूप धारण कर चुकी पंडिताई आक्रामक हो चुकी है, फिर भी वह खींचती है अपनी तरफ। दशाश्वमेध से कुछ दूरी पर स्थित हैं मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट। ये दोनों घाट हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार के लिए प्रसिद्ध हैं। चिता से उठती लपटें भौतिकता से ग्रस्त तीर्थयात्रियों को जीवन की नश्वरता का संकेत देती हैं। आप यहां वितृष्णा से नहीं भरते और न ही विचलित होते हैं। आप जीवन के प्रति गंभीर हो जाते हैं। आपका अहं टूटता है यहां। पुनर्संस्कार करते हैं बनारस के घाट।
बनारस मंदिरों का शहर है। काशी विश्वनाथ, संकट मोचन, मानस मंदिर आदि श्रद्धालु हिंदुओं के प्रसिद्ध तीर्थस्थल हैं। बनारस के विश्वनाथ का महात्म्य कुछ अधिक है। अन्य मंदिरों में भी भीड़ लगी रहती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ शहर के बाहर से आये श्रद्धालु ही इन मंदिरों में दर्शन के लिए आते हों। बनारस स्वयं आध्यात्मिक शहर है। धर्म और आध्यात्म यहां के निवासियों के जीवन में है। यह उनकी आदत है। सुबह-सुबह गंगा जाने से आरंभ हुई दिनचर्या में मंदिर भी शामिल हैं।

सबसे पुराना शहर है वाराणसी - Varanasi is Oldest City

बनारस के बारे में प्रसिद्ध दार्शनिक मार्क ट्वेन ने कहा था कि यह शहर इतिहास और किंवदंतियों से भी पुराना है। निश्चय ही, वे इस शहर के इतिहास के बारे में बातें नहीं कर रहे थे। वे शहर के जीवन में मौजूद इतिहास और किंवदंतियां देख रहे होंगे। बनारस के रोजमर्रा के जीवन की मस्ती उसे दूसरे शहरों से अलग करती है। चाय और पान की दुकानों पर दुनिया भर की समस्याओं को सुलझाते बनारसी सिर्फ समय बिताने के लिए ऐसा नहीं करते। वे उसमें लीन होते हैं। वे अपने पक्ष में तर्क देते हैं, बहस करते हैं और किसी अन्य की समस्या पर हाथापाई करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं।

वाराणसी में क्या मशहूर है - Famous in Varanasi


बनारसी पान दुनिया भर में मशहूर है। बनारसी पान चबाना नहीं पड़ता। यह मुंह में जाकर धीरे-धीरे घुलता है और सुवासित कर देता है मन को भी। बनारस जाने पर वहां इसे अवश्य चखें। बनारसी चाट का चटपटा स्वाद जीभ पर ठहर जाता है। यह अनोखा है। अनोखी हैं यहां की मिठाइयां। रबड़ी, रसगुल्ला, मलाई और छेने की अन्य मिठाइयां सिर्फ मुंह मीठा नहीं करतीं। वे आपके व्यक्तित्व में भी मिठास घोलती हैं। मशहूर कचौड़ी गली की खुशबू आपको आगे नहीं बढ़ने देगी।
कहते हैं कि कई विदेशी पर्यटक बनारस आने के बाद फिर से अपने देश नहीं लौट सके। वे बनारसी हो गये। ढल गये यहां की सादगी और धीमी रफ्तार जिंदगी में। एक व्यक्ति और क्या चाहता है? सुख, शांति और संतुष्टि … यह शहर इस दृष्टि से उपयुक्त है। इसी शहर में आप उस्ताद बिस्मिल्ला खान जैसे मशहूर शहनाई वादक को तहमद बांधे गलियों में आराम से घूमते देख सकते हैं (यह निबंध उस वक्‍त लिखा गया था, जब बिस्मिल्‍ला खां जीवित थे : मॉडरेटर)। दिखावा नहीं है इस शहर में। इस शहर में जीवन की मस्ती है। उसे भरपूर जीने की ललक है। बनारस भौतिकता और ओढ़ी हुई जीवनशैली को अनावृत्त करता है। वह सहज कर देता है आपको।
बनारस भारत का अदभुत शोकेस है। इस शोकेस में भारतीय धर्म और अध्यात्म की परंपराएं, विभिन्न जीवनशैलियां, सदियों का सांद्र अनुभव और भारतीय समाज की तंद्रिल आस्थाएं मौजूद हैं। बनारस शहर कौतूहल पैदा करता है। वह उस कौतूहल को शांत भी करता है, अगर आप हड़बड़ी में न हों। अंत में फिर से केदारनाथ सिंह की पंक्तियों में कहें तो,

किसी अलक्षित सूर्य को देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टांग से बिल्कुल बेखबर।

क्या आपने इस शहर को देखा है? अगर नहीं तो अवश्य जाएं और स्वयं का साक्षात्कार करें बनारस के आईने में

Wednesday, September 14, 2011

कुत्ते की दो प्रमुख चेष्टाएँ

कुत्ते की दो प्रमुख चेष्टाएँ 

कुत्ते की तीन प्रमुख आदतें है!
  • भोकना 
  • भिजन कम चबाकर ही निगल जाना और 
  • सोने से पहले उस स्थान का चक्कर काटना
जिसमे भौकना की आदात इनमे क्यों है, इसका वर्णन पहले किया जा चूका है कुत्ते में भौकने की आदत क्यों होती है? , अब कम चबाकर ही भोजन निगल जाने की क्रिया पर विचार करे! -

पूर्व समय में कुत्ता मूलतः जंगली पशु था ! जब यह जंगल में रहता था तो समूह में शिकार करता था और समूह में ही खाया करता था ! समूह भोजन और पशु का लोभ से उसमे चबा -चबा केर खाने से यह कम खा पाता! ऐसी स्थिति में उसने खाने के बजाय निगलना शुरू कर दिया!

सोने से पहले चक्कर काटने के सम्बन्ध में प्राणी शास्त्रियों का कहना है की जब यह जंगल में घास में रहा करता था तो घास इस जाती कको चुभा करती थी, इसलिए चारो तरफ घूमकर यह ऊची घास को झुकाकर या रोंदकर इस तरह कर कर लिया कर लेता था की वह उसे चुभे नहीं!

इनमे अन्वीक्षण का परिणाम है और कुत्ते में ये आदत आज भी विधमान है!

कुत्ते में भोकने की आदत क्यों ?

कुत्ते में भोकने की आदत क्यों

न्यायाधिकरण ने कुत्ते की साक्षी को वैधानिक महत्व भले ही न दिया हो, किन्तु खोजी कुत्ते की बुद्धि से और अनुसन्धान शक्ति से पुलिस से अनेक असम्य अपराधो का रहयोद्घातन किया जाता है !

यह प्राणी घ्राण जीवी है, "सोम्तत्व" के अनुपात को यह अच्छी तरह जान सकता है! भय के आवेश में सोम्तत्व नस्त हो जाता है और सोम्तत्व की कमी से यह उत्तेजित होता है! इसलिए डरने या दर केर भागने वाले व्यक्ति के पीछे यह अधिक भोकता है! चोरो में भी भय अधिक होने के कारन सोम्तत्व की कमी हो जाती है ! इसिये यह पाचन केर लेता है! आलावा प्रेतों, पीशाचो और यमदूतो को भी यह देख लेता है! प्रेत विधा विषार दे का यह विश्वास है की प्रेतग्रस्त घर में कुत्ता रहे तो वह उसे देखकर भोकने लगेगा तथा उसके भोकने से प्रेत की शांति भंग होगी और वह वहा से भाग जायेगा !

कुत्ते की चेष्टाए और शगुन फल

Tuesday, September 13, 2011

जानिए, किस तिथि पर किसका श्राद्ध करें

जानिए, किस तिथि पर किसका श्राद्ध करें

आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितरों को तृप्त करने का समय है इसलिए इसे पितृपक्ष कहते हैं। पंद्रह दिन के इस पक्ष में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती इस समस्या के समधान के लिए पितृपक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी नियत की गई हैं जिस दिन श्राद्ध करने से हमारे समस्त पितृजनों की आत्मा को शांति मिलती है। यह प्रमुख तिथियां इस प्रकार हैं-

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा श्राद्ध(13 सितंबर, मंगलवार)- यह तिथि नाना-नानी के श्राद्ध के लिए उत्तम मानी गई है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि भी ज्ञात न हो तो इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। इससे घर में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

पंचमी श्राद्ध(17 सितंबर, शनिवार)- इस तिथि पर उन परिजनों काश्राद्ध करने का महत्व है जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो। इसे कुंवारा पंचमी भी कहते हैं।

नवमी श्राद्ध(21 सितंबर, बुधवार)- यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी कहते हैं। इस तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

एकादशी व द्वादशी श्राद्ध(23 व 24 सितंबर)- इस तिथि को परिवार के उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है जिन्होंने संन्यास लिया हो।

चतुर्दशी श्राद्ध(26 सितंबर, सोमवार)- यह तिथि उन परिजनों के श्राद्ध के लिए उपयुक्त है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो जैसे- दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, शस्त्र के द्वारा आदि।

सर्वपितृमोक्ष अमावस्या(27 सितंबर, मंगलवार)- किसी कारण से पितृपक्ष की सभी तिथियों पर पितरों का श्राद्ध चूक जाएं या पितरों की तिथि याद न हो तब इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं। इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है।

श्राद्ध पक्ष क्या है? पितरों का ऋण चुकाने का समय क्या है?

आश्विन मास के कृष्णपक्ष के पंद्रह दिन पितृपक्ष के नाम से नाम से जाने जाते हैं। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। 

पितरों का ऋण चुकाने का समय है : श्राद्ध पक्ष

पितृपक्ष श्राद्धों के लिए निश्चित पंद्रह तिथियों का एक समूह है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय(श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं।

धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्डदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है। श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। इसलिए प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

श्राद्ध कैसे करे? श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन करने की विधि क्या है?

श्राद्धपक्ष में पितरों की तृप्ति के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराने का बहुत महत्व है। क्योंकि ऐसी धार्मिक मान्यता है कि ब्राह्मणों के साथ वायुरूप में पितृ भी भोजन करते हैं इसलिए विद्वान ब्राह्मणों को पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ भोजन कराने पर पितृ भी तृप्त होकर सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।


इस विधि से कराएं श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन

श्राद्ध पक्ष में ब्राह्मणों को किस तरह यथाविधि भोजन कराना चाहिए -
  • श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मण या ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें।
  • श्राद्ध दोपहर के समय करें।
  • श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।
  • पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।
  • तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें।
  • इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।
  • कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं, किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं।
  • इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
  • पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।
  • ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं।
  • ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।

श्राद्ध के लिए यही समय श्रेष्ठ क्यों है?

श्राद्ध के लिए यही समय श्रेष्ठ क्यों है?

हिंदू पंचांग के आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष कहते हैं। इस वर्ष श्राद्ध पक्ष 12 सितम्बर से 27 सितंबर तक रहेगा। सनातन धर्म में इस पूरे पक्ष यानी 15 दिन का समय पूर्वजों को तृप्त करने और उनके प्रति आस्था प्रकट करने के लिए ही बनाया गया है।

हर धर्म का आधार श्रद्धा है। सभी धर्मों में पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा के भाव का महत्व बताया गया है। सनातन धर्म में श्रद्धा प्रगट करने का ही एक धार्मिक कर्म श्राद्ध है। श्राद्ध में हम अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। अपने मृत पितृगण यानी पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक कर्म विशेष किए जाने के कारण इसका नाम श्राद्ध पड़ा। इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं।

शास्त्रों में आश्विन मास के प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक श्राद्ध करने के अलग-अलग फल बताए गए हैं। शास्त्रों के अनुसार वर्ष में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध का विशेष महत्व है। ये महालय श्राद्ध भी कहलाते हैं। मह का अर्थ होता है 'उत्सव का दिन' और आलय यानी 'घर'। इस कृष्ण पक्ष में पितरों का निवास माना गया है इसलिए इस काल में पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध किए जाते हैं।

पितरों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक तिल, कुश तथा जल आदि पदार्थों के त्याग एवं दान कर्मों को श्राद्ध कहा जाता है। इस प्रकार पितरों के प्रति श्रद्धा ही श्राद्ध का मुख्य भाव है यानी श्राद्ध पूर्वजों के प्रति श्रद्धा जगाता है।

पितृ दोष का प्रभाव कम करने के उपाय

यह टोटके करें, कम होगा पितृ दोष का प्रभाव

जिस भी व्यक्ति को पितृ दोष होता है उसे जीवन में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार पितृ दोष सफलता न मिलने का कारण भी होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जातक की कुंडली में स्थित ग्रह पितृ दोष के बारे में बता देते हैं। 

यूं तो पितृ दोष के लिए कई ग्रह जिम्मेदार होते हैं लेकिन इनमें राहु-केतु की भूमिका प्रमुख होती है। पितृ दोष की शांति के लिए श्राद्ध पक्ष उत्तम समय होता है। पितृ दोष शांति के लिए कुछ साधारण टोटके इस प्रकार हैं-



यह टोटके करें कम होगा पित्र दोष का अशुभ प्रभाव

  • राहु की शांति के लिए शनिवार को तथा केतु की शांति के लिए मंगलवार का व्रत रखें।
  • शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाएं।
  • ब्रह्मभोज और पशुओं में कुत्ते को खाना खिलाने से केतु की शांति होती है।
  • राहु दोष शांति के लिए शनिवार के दिन महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।
  • सोमवार को नागों के देवता भगवान शिव और विघ्र हरने वाले श्रीगणेश की आराधना करें।
  • राहु-केतु के मंत्रों का जप करें।
  • शनिवार को राहु की प्रसन्नता के लिए पूरे दिन नीले या काले कपड़े पहनें।

इस हनुमान मंत्र से दूर होंगे संकट

इस हनुमान मंत्र से दूर होंगे संकट

जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। ऐसे में हनुमानजी की आराधना करना ही सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि वे ही संकटमोचन अर्थात संकटों को दूर करने वाले हैं। नीचे लिखे इस हनुमान मंत्र का यदि विधि-विधान से जप किया जाए तो हनुमानजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और सभी संकट दूर हो जाते हैं।



मंत्र 

ऊँ नमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा


जप विधि

- सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ  वस्त्र पहनें।

- इसके बाद अपने माता-पिता, गुरु, इष्ट व कुल देवता को नमन कर कुश का आसन ग्रहण करें।

- पारद हनुमान प्रतिमा के सामने इस मंत्र का जप करेंगे तो विशेष फल मिलता है। 

- जप के लिए लाल हकीक की माला का प्रयोग करें।

स्वप्न-विचार - सपने क्यूँ आते हैं?

स्वप्न-विचार - सपने क्यूँ आते हैं?

इन्सान मे यह गुण है कि वह सपनों को सजाता रहता है या यूँ कहे कि भीतर उठने वाली हमारी भावनाएं ही सपनो का रूप धारण कर लेती हैं । इन उठती भावनाओं पर किसी का नियंत्रण नही होता । हम लाख चाहे,लेकिन जब भी कोई परिस्थिति या समस्या हमारे समक्ष खड़ी होती है,हमारे भीतर भावनाओं का जन्म होनें लगता है । ठीक उसी तरह जैसे कोई झीळ के ठहरे पानी में पत्थर फैंकता है तो पानी के गोल-गोल दायरे बननें लगते हैं । यह दायरे प्रत्येक इन्सान में उस के स्वाभावानुसार होते हैं । इन्हीं दायरों को पकड़ कर हम सभी सपने बुननें लगते हैं ।यह हमारी आखरी साँस तक ऐसे ही चलता रहता है ।

इसी लिए हम सभी सपने दॆखते हैं ।शायद ही ऐसा कोई इंसान हो जिसे रात को सोने के बाद सपनें ना आते होगें । जो लोग यह कहते हैं कि उन्हें सपनें नही आते, या तो वह झूठ बोल रहे होते हैं या फिर उन्हें सुबह उठने के बाद सपना भूल जाता होगा । हो सकता है उन की यादाश्त कमजोर हो । या फिर उनकी नीदं बहुत गहरी होती होगी । जैसे छोटे बच्चों की होती है । उन्हें आप सोते समय अकसर हँसता- रोता हुआ देखते रहे होगें , ऐसी गहरी नीदं मे सोनें वाले भी सपनों को भूल जाते हैं और दावा करते हैं कि उन्हें सपनें नही आते । लेकिन सपनों का दिखना एक स्वाभाविक घटना है । इस लिए यह सभी को आते हैं ।

लेकिन हमें सपने आते क्यूँ हैं ?
इस बारे में सभी स्वप्न विचारकों के अपने-अपने मत है । कुछ विचारक मानते हैं कि सपनॊं का दिखना इस बात का प्रमाण है कि आप के भीतर कुछ ऐसा है जो दबाया गया है । वहीं सपना बन कर दिखाई देता है । हम कुछ ऐसे कार्य जो समाज के भय से या अपनी पहुँच से बाहर होने के कारण नही कर पाते, वही भावनाएं हमारे अचेतन मन में चले जाती हैं और अवसर पाते ही सपनों के रूप में हमे दिखाई देती हैं । यह स्वाभाविक सपनों की पहली स्थिति होती है ।
एक दूसरा कारण जो सपनों के आने का है,वह है किसी रोग का होना। प्राचीन आचार्य इसे रोगी की "स्वप्न-परिक्षा" करना कहते थे ।
हम जब भी बिमार पड़ते हैं तो मानसिक व शरीरिक पीड़ा के कारण हमारी नीदं या तो कम हो जाती है या फिर झँपकियों का रूप ले लेती है । ऐसे में हम बहुत विचित्र-विचित्र सपने देखते हैं । कई बार ऐसा भी होता है कि बहुत डरावनें सपने आने लगते हैं । जिस कारण रात को कई-कई बार हमारी नीदं खुल जाती है और फिर भय के कारण हमे सहज अवस्था मे आने में काफी समय लग जाता है ।

इस बारे में प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों का मानना है कि रोगी अवस्था मे आने वाले सपनें अकसर रोग की स्थिति की ओर संकेत करते हैं । वे आचार्य रोगी के देखे गए सपनों के आधार पर रोग की जटिलता या सहजता का विचार करने में समर्थ थे । वह इन का संम्बध , उन रोगीयों की मानसिक दशाओ की खोज का विषय मानते थे और उसी के परिणाम स्वरूप जो निष्कर्ष निकलते थे , उसी के अनुसार अपनी चिकित्सा का प्रयोग उस रोग का निदान करने मे करते थे । उन आचार्यों के स्वप्न विचार करने के कुछ उदाहरण देखें-

१.यदि रोगी सिर मुंडाएं ,लाल या काले वस्त्र धारण किए किसी स्त्री या पुरूश को सपने में देखता है या अंग भंग व्यक्ति को देखता है तो रोगी की दशा अच्छी नही है ।

२. यदि रोगी सपने मे किसी ऊँचे स्थान से गिरे या पानी में डूबे या गिर जाए तो समझे कि रोगी का रोग अभी और बड़ सकता है।

३. यदि सपने में ऊठ,शेर या किसी जंगली जानवर की सवारी करे या उस से भयभीत हो तो समझे कि रोगी अभी किसी और रोग से भी ग्र्स्त हो सकता है।

४. यदि रोगी सपने मे किसी ब्राह्मण,देवता राजा गाय,याचक या मित्र को देखे तो समझे कि रोगी जल्दी ही ठीक हो जाएगा ।

५.यदि कोई सपने मे उड़ता है तो इस का अभिप्राय यह लगाया जाता है कि रोगी या सपना देखने वाला चिन्ताओं से मुक्त हो गया है ।

६.यदि सपने मे कोई मास या अपनी प्राकृति के विरूध भोजन करता है तो ऐसा निरोगी व्यक्ति भी रोगी हो सकता है ।

७,यदि कोई सपने में साँप देखता है तो ऐसा व्यक्ति आने वाले समय मे परेशानी में पड़ सकता है ।या फिर मनौती आदि के पूरा ना करने पर ऐसे सपनें आ सकते हैं।

ऊपर दिए गए उदाहरणों के बारे मे एक बात कहना चाहूँगा कि इन सपनों के फल अलग- अलग ग्रंथों मे कई बार परस्पर मेल नही खाते । लेकिन यहाँ जो उदाहरण दिए गए हैं वे अधिकतर मेल खाते हुए हो,इस बात को ध्यान मे रख कर ही दिए हैं।

ऐसे अनेकों सपनों के मापक विचारों का संग्रह हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने जन कल्याण की भावना से प्रेरित हो , हमारे लिए रख छोड़ा है । यह अलग तथ्य है कि आज उन पर लोग विश्वास कम ही करते हैं ।

यहाँ सपनों के आने का तीसरा कारण भी है ।वह है सपनों के जरीए भविष्य-दर्शन करना ।

हम मे से बहुत से ऐसे व्यक्ति भी होगें जिन्होंने सपनें मे अपने जीवन मे घटने वाली घटनाओं को, पहले ही देख लिया होगा । ऐसा कई बार देखने मे आता है कि हम कोई सपना देखते हैं और कुछ समय बाद वही सपना साकार हो कर हमारे सामने घटित हो जाता है । यदि ऐसे व्यक्ति जो इस तरह के सपने अकसर देखते रहते हैं और उन्हें पहले बता देते हैं , ऐसे व्यक्ति को लोग स्वप्न द्रष्टा कहते हैं ।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी कई जगह ऐसे सपने देखनें का जिक्र भी आया है , जैसे तृजटा नामक राक्षसी का उस समय सपना देखना,जब सीता माता रावण की कैद मे थी और वह सपनें मे एक बड़े वानर द्वारा लंका को जलाए जाने की बात अपनी साथियों को बताती है । यह भी एक सपने मे भविष्य-दर्शन करना ही है ।

कहा जाता है कि ईसा मसीह सपनों को पढना जानते थे । वह अकसर लोगो द्वारा देखे सपनों की सांकेतिक भाषा को सही -सही बता देते थे । जो सदैव सत्य होते थे ।

आज की प्रचलित सम्मोहन विधा भी भावनाऒं को प्रभावित कर,व्यक्ति को सपने की अवस्था मे ले जाकर, रोगी की मानसिक रोग का निदान करने में प्रयोग आती है । वास्तव मे इस विधा का संम्बध भी सपनों से ही है । इस मे भावनाओं द्वारा रोगी को कत्रिम नीदं की अवस्था मे ले जाया जाता है ।

कई बार ऐसा होता है कि हम जहाँ सो रहे होते है, वहाँ आप-पास जो घटित हो रहा होता है वही हमारे सपने में जुड़ जाता है । या जैसे कभी हमे लघुशंका की तलब लग रही होती है तो हम सपने भी जगह ढूंढते रहते हैं। हमारा सपना उसी से संबंधित हो जाता है।

पुरानी मान्यताओं के अनुसार कईं बार अतृप्त आत्माएं भी सपनों मे आ-आ कर परेशान करती हैं...ऐसे में अक्सर रात को सोते में शरीर का भारी हो जाना...और सपने मॆ भय से चिल्लानें में आवाज का ना निकल पाना, महसूस होता है। दूसरों द्वारा किए गए तंत्र-मंत्र या जादू टोनों के प्रभाव के कारण भी रात को डरावने सपनें आते हैं। 

किस्मत के इशारें: जानें, कब से शुरु हो रहा है आपका बुरा समय

किस्मत के इशारें: जानें, कब से शुरु हो रहा है आपका बुरा समय

संकेत ज्योतिष के अनुसार अच्छे या बुरे दिन शुरु होने से पहले ही हर व्यक्ति को उसका संकेत मिलने लग जाता है। अगर अच्छे दिन आने वाले है तो अच्छे संकेत आपको मिलने लग जाते हैं। वहीं अगर बुरे दिन आने वाले होते हैं तो उससे पहले आपको अशुभ संकेत मिलने लगेंगे जानिए बुरा समय शुरु होने से पहले क्या संकेत मिलते हैं।



- अगर घर के सदस्यों में अचानक मन मुटाव होने लगे तो समझें कुछ ही दिनों में धन हानि हो सकती है।

- अगर घर के किसी सदस्य से सोना गुम हो जाए तो उस महीने में कुछ बुरा हो सकता है।

- अगर कुत्ता आपके घर की तरफ मुंह कर रोने लगे तो समझें आने वाले सात दिन आपके लिए अच्छे नहीं है। 

- आपका कुत्ता खो जाए या मर जाए तो समझ लेना चाहिए कि बुरे दिन आने वाले हैं।

- घर में अगर तेल से संबंधित नुकसान होने लगे तो समझना चाहिए शनि के कारण बुरे दिन शुरु होने वाले हैं।

- आपके घर के बाहर काले कुत्ते का लडऩा और खुजलाना भी अशुभ संकेत है।

- घर में कोर्ई मांगलिक कार्य होने वाला हो और कोई सदस्य बीमार हो जाए तो समझ लेना चाहिए कुछ अमंगल होने वाला है।

किस्मत चमकानी है तो कुछ इस तरह करें रत्नों का उपयोग

किस्मत चमकानी है तो कुछ इस तरह करें रत्नों का उपयोग

ज्योतिष में हर राशि के लिए अलग अलग रत्न होता है। ये रत्न इंसान की किस्मत बनाते और बिगाड़ते है । कुंडली में इन राशि स्वामी की शुभ अशुभ स्थिति का विचार करके ही रत्नों को पहनना चाहिए। रत्न को अँगूठी या लॉकेट में पहनना चाहिए। रत्नों को पहनते समय यह सावधानी रखें कि यह शरीर से सटा हुआ हो। इससे रत्नों का असर दोगुना हो जाता है।
माणिक-
 यह सूर्य का रत्न है। यदि आपकी कुंडली में सूर्य अशुभ प्रभाव दे रहा है तो इसे रविवार के दिन सूर्योदय के समय अनामिका यानि रिंग फिंगर में तांबे या सोने की अंगुठी या लॉकेट में पहनना चाहिए।

मोती- कुंडली में चंद्रमा को शुभ बनाने के लिए मोती पहनना चाहिए। यह चंद्रमा का रत्न है। इसे सोमवार के दिन कनिष्ठा अंगुलि में यानि लिटिल फिंगर में चंदी की अंगुठी या लॉकेट में पहनना चाहिए।

पन्ना- बुध के शुभ प्रभाव के लिए पन्ना सोने की अंगुठी में बुधवार के दिन पहना जाता है। यह कनिष्ठा अंगुलि में यानि लिटिल फिंगर में पहने तो ज्यादा प्रभावशाली होता है।

पुखराज- गुरु को प्रसन्न करने के लिए गुरुवार के दिन इस रत्न को गोल्ड रिंग में तर्जनी अंगुलि यानि इंडेक्स फिंगर में पहनना चाहिए।

मूँगा- यह मंगल का रत्न है। मंगल देव के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए इस रत्न को अनामिका यानि रिंग फिंगर में तांबे या सोने की अंगुठी या लॉकेट के साथं पहना जाता है।

हीरा- कुंडली में शुक्र देव के शुभ प्रभाव प्राप्त करने के लिए शुक्र देव का रत्न अनामिका यानि रिंग फिंगर में चांदी की अंगुठी या लॉकेट के साथ पहनें। 

नीलम- शनि का रत्न होता है। शनि देव को प्रसन्न करने के लिए मध्यमा अंगुली में यानि मिडील फिंगर में चांदी की अंगुठी या लॉकेट के साथ पहनना चाहिए। शनिवार के दिन पहनें तो विशेष लाभ प्राप्त होता है।

राहू-केतु के रत्न न पहन कर आप लाल किताब के अनुसार टोटके कर के शुभ प्रभाव प्राप्त कर सकते हैं।

स्वप्नों का रहस्य व फल

यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक हिप्पोक्रेटस का मानना था कि निद्रा के समय आत्मा शरीर से अलग होकर विचरण करती है और ऐसे में जो देखती है या सुनती है, वही स्वप्न है। अरस्तू ने अपनी पुस्तक 'पशुओं के इतिहास' में लिखा है कि केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु भेड़, बकरियाँ, गाय, कुत्ते, घोड़े इत्यादि पशु भी स्वप्न देखते हैं।

प्राचीन भारतीय दार्शनिकों के अनुसार, आत्मा चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने और भ्रमण करने के बाद मनुष्य योनि प्राप्त करती है। स्वप्न के माध्यम से वह विभिन्न योनियों में अर्जित अनुभवों का पुनः स्मरण करती है।

स्वप्नों के प्रकार क्या क्या है?

  • दृष्ट- जो जाग्रत अवस्था में देखा गया हो उसे स्वप्न में देखना। 
  • श्रुत- सोने से पूर्व सुनी गई बातों को स्वप्न में देखना। 
  • अनुभूत- जो जागते हुए अनुभव किया हो उसे देखना। 
  • प्रार्थित- जाग्रत अवस्था में की गई प्रार्थना की इच्छा को स्वप्न में देखना। 
  • दोषजन्य- वात, पित्त आदि दूषित होने से स्वप्न देखना। 
  • भाविक- जो भविष्य में घटित होना है, उसे देखना। उपर्युक्त सपनों में केवल भाविक ही विचारणीय होते हैं। 

स्वप्न फल के  बारे में जाने

प्रकृति अपने ढंग से भावी शुभाशुभ संकेत देती है। स्वप्न भी इसका माध्यम होते हैं। स्वप्नों के फलों की विवेचना के संदर्भ में भारतीय ग्रंथों में इनके देखे जाने के समय, तिथि व अवस्था के आधार पर इनके परिणामों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। इनके अनुसार-

  • शुक्ल पक्ष की षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी तथा कृष्ण पक्ष की सप्तमी तथा चतुर्दशी तिथि को देखा गया स्वप्न शीघ्र फल देने वाला होता है। 
  • पूर्णिमा को देखे गए स्वप्न का फल अवश्य प्राप्त होता है। 
  • शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया व कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवमी को देखा गया स्वप्न विपरीत फल प्रदान करता है।
  • शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, कृष्ण पक्ष की द्वितीया के स्वप्न का देरी से फल प्राप्त होता है। 
  • शुक्ल पक्ष की चतुर्थी व पंचमी को देखे गए स्वप्न का फल 2 माह से 2 वर्ष के अंदर प्राप्त होता है। 
  • रात्रि के प्रथम, द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ प्रहर के स्वप्नों का फल क्रमशः 1 वर्ष, 8 माह, 3 माह व 6 दिन में मिलता है। 
  • उषाकाल में देखे गए स्वप्न का फल दस दिन में मिलता है। 
  • सूर्योदय से पूर्व देखे जाने वाल स्वप्न का फल अतिशीघ्र प्राप्त होता है।

स्वप्न: भविष्य का संकेत या कुछ और

सपनों का जीवन में विशेष महत्व है। सपने भविष्य में होने वाली घटनाओं की पूर्व सूचना देते हैं। 

दोस्तों सपने हर इन्सान देखता है फिर वो चाहे जागते हुए हो या फिर सोते हुए! लेकिन हम यहाँ आज नींद के बाद आने वाले सपनो के बारे में बात कर रहे है जो हम सभी सोते हुए देखते है,
इनका अपना गोपनीय महत्व होता है। सपनो की दुनिया हमेशा रहस्य से भरी हुई रहती है!

हम सभी के मन में हमेशा ये सपने एक रहस्य के सामान बने रहे है और अनेको सवाल के घेरे में हमें ये सवाल सपनों के जरिये छोड़ जाते है!
 

सपनो के बारे में कुछ सवाल ऐसे है जो हमें उलझा कर रख देते है !

  • क्या हमारे सो जाने के बाद शरीर और दिमाग पूरी तरह शांत और स्थिर हो जाता है और उसे दुनिया जहाँ की कोई खबर नहीं रहती? अगर ऐसा है तो हमारे शरीर सुप्त अवस्था में भी कैसे जान जाता है के कोई हमें पुकार रहा है या घडी में ठीक 6 बज गए है और उठने का समय हो गया है, जबकि कोई अलार्म भी नहीं लगाया गया
  • अक्सर सपनो में देखी तमाम बाते भविष्य में होने वाली घटना से क्यों मिलती है?
  • क्या हमारे दिमाग में या शरीर में कोई सुप्त शक्ति है जिसका कुछ इस्तेमाल हमारे सो जाने पर दिमाग या शरीर करता है, क्या वो शक्ति भविष्य का भ्रमण कर शक्ति है या होने वाली घटना को देख सकती है! क्या व हमारी मानसिक शक्ति है जो हमें सपनो के जरिये आगाह करती है!
स्वप्न ज्योतिष के द्वारा में आज आपको कुछ सपनो के बाते में और उनके फल के बारे में नीचे बता रहा हूँ,
स्वप्न ज्योतिष ने सपनो के बारे में बहुत कुछ लिखा और बताया है इस सबके बारे में!

स्वप्न ज्योतिष के अनुसार रात के प्रथम प्रहर में जो स्वप्न दिखते हैं उसका एक वर्ष में शुभ या अशुभ फल मिलता है। दूसरे प्रहर में जो स्वप्न दिखते हैं उनका 9 माह में, तीसरे प्रहर में देखे गए सपने का 3 माह में, 4 प्रहर में देखे सपने का एक माह में और प्रात:काल के स्वप्न तुरंतफल देते हैं।

 स्वप्न के प्रकार (Types of Dream)

स्वप्न ज्योतिष के विद्वानों के अनुसार स्वप्न दो प्रकार के होते हैं एक इष्ट फल देने वाला तथा दूसरा दुष्ट फल देने वाला। इष्ट तथा दुष्ट फल देने वाले स्वप्न की जानकारी नीचे दी गई है-
  • नदी या समुद्र में तैरना, आकाश में उडऩा, सूर्योदय, प्रज्वलित आग, सूर्य आदि देखना, महल, मंदिर, शिखर चढऩे का सपना देंखे तो हर कार्य सफल व सिद्ध होता है।
  • स्वप्न में शराब पीना, मांस खाना, कीड़े खाना, शरीर पर विष्ठा(मल) लगाना, शरीर पर रक्त लगाना व दही-भात खाना शुभ व लाभदायक होता है।
  • स्वप्न में श्वेत चंदन लगाना, अलंकार पहनना अथवा पहने हुए देखना, यह सब देखने वाले व्यक्ति को शुभ समाचार मिलता है।
  • सूर्य या चंद्र को स्वप्न में निस्तेज देखना, ध्रुव या अन्य तारों को गिरते हुए देखने पर मनुष्य मरण अथवा शोक को प्राप्त होता है।
  • स्वप्न में यदि स्वयं को नाव में बैठकर नदी पार करते देखते हैं तो दूर की यात्रा का योग बनता है।
  • यदि स्वप्न में गंदे नाले में स्वयं को गिरते हुए देंखे तो बीमारी होती है और एक महीने के भीतर ही किसी बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ता है।
  • जो व्यक्ति स्वप्न में गेंहू का ढेर देखता है तो उसे अचानक धन लाभ होता है।
  • स्वप्न में यदि दांत गिरते हुए देंखे तो आयु बढ़ती है।
  • यदि स्वप्न में सर्प दिखे तो अनिष्ट होने की संभावना रहती है तथा वंश वृद्धि में भी परेशानी आती है।
  • स्वप्न में घर का दरवाजा गिरते हुए देखें तो कुल का नाश हो जाता है।
  • स्वयं को स्वप्न में पर्वत पर चढ़ते हुए देंखे तो उच्चपद की प्राप्ति होती है।
  • सपने में खुद को थूकते हुए देंखे तो अनिष्ट फल मिलता है। 

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